विकास पागल हो गया

       मन की बात लगे तो सुन लीजिये और ढंग की बात लगे तो सोच लीजिये .
       हर तरफ एक ही चर्चा है -विकास, विकास और विकास. दीवारों पर एक ही नारा लिखा मिलता है- सबका साथ, सबका विकास . सत्तर और अस्सी के दशक में दो ही नारे नंबर वन की होड़ में होते थे -जय गुरुदेव नाम परमात्मा का , और दुल्हन वही जो पाठक जी दिलवायें. कभी यह पहले पायदान पर कभी वह. आज की बात अलग है हर तरफ विकास ही विकास, दूसरे पायदान के लिए बाबा रामदेव और एम डी एच मसाले वाले दादाजी में होड़ रहती है, वैसे तो बाबा रामदेव योग और  स्वदेशी के बल पर आगे निकल चुके हैं.

मुझे भी जिज्ञासा हुई विकास के बारे में जानने की .  इतिहास के पृष्ठ खंगाले तो पता चला कि इंदिरा जी ने बताया कि पहले नसबंदी करा लो तब ‘विकास’ होगा. बात समझ में तो आने वाली नहीं थी कि जब नसबंदी ही करा लेगे तो ‘विकास’ होगा कैसे? पर जब बात प्रधानमंत्री ने कही हो सबके समझ में आ जाती है लिहाज़ा कुछ लोगों ने अपने मन से करा ली और बहुतों की तो  अधिकारियों ने जबरदस्ती कर दी. सारे टोने -टोटके करा के देख लिए पर ‘विकास’ न हुआ , हाँ इस में चक्कर इंदिरा जी की कुर्सी जरूर चली गयी .

इंदिरा जी का ज़माना चला गया. चौधरी चरण सिंह, राजीव गाँधी, वी पी सिंह , चंद्रशेखर जी, नरसिम्हा राव जी, देवगौड़ा जी , गुजराल साहब, अटल जी, जैसे बड़े बड़े नेता आये लेकिन ‘विकास’ नहीं हुआ.  हुआ भी होगा पर किसी ने ढोल नहीं पीटा, मिठाई नहीं बंटवाई, किन्नरों के डांस नहीं हुए , इसलिए लोगों को उसके होने  पता नहीं चला .  धीरे-धीरे लोग विकास को भूल गए, उसकी इच्छा समाप्त हो गयी. क्या किसी के होने न होने से दुनिया नहीं चलती.

सब कुछ ठीक चल रहा था तभी डा मनमोहनसिंह जी प्रधानमंत्री बन गए तो उन्होंने ‘प्रगति’ पर ध्यान देना शुरू किया और प्रगति होने भी लगी थी पर २०१४ में मोदी जी ने लोगों  को समझाया कि मित्रों, ‘विकास’ होना चाहिए (पुल्लिंग है न ), ‘प्रगति’ का क्या फ़ायदा( स्त्रीलिंग है न). हम भारतीयों की एक ख़ास बात है कि हम भूल भी जल्दी जाते है और  समझावे में भी जल्दी आ जाते है. अब हमें समझ आ चुका था कि हमारा समाज पुरुष प्रधान है इसलिए ‘ विकास’ तो होना ही चाहिए , यह हमारी आन, बान और शान का मामला है. उन्हें बताया गया कि जबतक लोगों का साथ नहीं होगा तबतक ‘विकास’ नहीं होगा – सबका साथ , सबका विकास. लोगों ने जोर- शोर से ‘विकास’ के लिए समर्थन दिया . मोदी जी प्रधान मंत्री बन गए.

हम सब बेताब थे कि ‘विकास’ अब होगा , अब होगा पर ‘ विकास, था कि होने का नाम ही नहीं ले रहा था. लोगों में कानाफूसी होने लगी . तरह-तरह की बातें बनने लगीं कि यह तो इनसे भी न होने वाला. अचानक एक बड़ा फैसला ले लिया गया- नोटबंदी  का. लोग सकते की हालत में आ गए . पूरा देश ए टी एम की लाईन में लग गया. बैंककर्मियों की दिन-रात की ड्यूटी लगा दी गयी. सारी व्यवस्था चरमरा उठी. लोगों की परेशानी को देखकर मोदी जी ने लोगों से पचास दिनों का टाइम माँगा और कहा की झेल लो यह परेशानी, यह तो कुछ ही दिनों की है, इसी नोटबंदी से विकास आएगा.  कुछ लोगों को मालूम हो गया कि एक ‘बंदी’ इंदिरा जी लेकर आई थीं तब भी विकास का वास्ता दिया गया था आज भी ‘नोटबंदी’ को विकास से जोड़ा जा रहा है. लेकिन लोग ‘विकास’ की चाहत में अपनी परेशानी को भूल गए और ‘विकास’ के होने की प्रतीक्षा , धड़कते दिलों से करने लगे.  एक माह बीता, दो माह बीता, देखते-देखते नौ महीने, दस महीने, पूरा साल बीत गया पर ‘विकास’ की जिद न हुआ तो न हुआ. फिर व्हाट्स अप पर समझाने वालो की बाढ़ आ गयी कि जब सत्तर सालों में विकास न हुआ तो तीन साल में इतनी बेताबी क्यों? और यह कि विकास की इतनी जल्दी आशा रखने वाले पाकिस्तान के बहकावे में हैं.

खैर, उन्ही दिनों खबर आई कि विकास चंडीगढ़ में मिल गया है. हम बड़े उत्साहित हुए कि कहीं तो हुआ ‘विकास’- दिल्ली न सही , चंडीगढ़ ही सही. पर हमारा उत्साह फ़ीका पर गया  यह समाचार पढ़कर कि विकास पर एफ आई आर दर्ज करा दिया गया है किसी को छेड़ने के मामले में. राहत की बात यह है कि अब वह ज़मानत पर रिहा है. वैसे यह विपक्षी दलों की चाल लगती है जो विकास चाहते  ही नहीं.

यह देश विकास की क़द्र नहीं करता उसे कभी चंडीगढ़ के जेल में , कभी दिल्ली जेल में डाल दिया जाता है, इतना ही नहीं अब तो राहुल गाँधी तक कहने लगे हैं कि विकास पागल हो गया है. उसके पिताजी से पूछिए तो वह बतायेंगे कि वह बिलकुल ठीक है. कोई अच्छी लड़की मिलेगी तो शादी भी कर देंगे. बड़े दुःख की बात है कि विकास हुआ भी तो पागल हो गया. पर हमें कैसे भी हो विकास का स्वागत करना चाहिए.

 

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